सपनों का बिखराव यहाँ, पल-पल मैंने होते देखा,
मीलों फ़ैली राहों पर भी, कुंठाओं को उगते देखा।
रस्में जीती रही यहाँ, हर भाव सुमन उजड़ते देखा।
मोह से घिरे मानव मन में, फ़िर सपनो को उगते देखा।
हमसे पूछा आज किसी ने, अब किसे है रोते देखा।
रीतों को तुम भूल गए अब, जो भार पराया ढोते देखा,
लश्कर पूरा छोड़ तुम्हे क्यों, दूर अकेले चलते देखा।
अब अपने दु:ख के सागर को है, सुख चैन हमारा धोते देखा.
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