नवंबर 13, 2008

अनुभव

पनों का बिखराव यहाँ, पल-पल मैंने होते देखा,

मीलों फ़ैली राहों पर भी, कुंठाओं को उगते देखा।

स्में जीती रही यहाँ, हर भाव सुमन उजड़ते देखा।

मो से घिरे मानव मन में, फ़िर सपनो को उगते देखा।

मसे पूछा आज किसी ने, अब किसे है रोते देखा।

रीतों को तुम भूल गए अब, जो भार पराया ढोते देखा,

श्कर पूरा छोड़ तुम्हे क्यों, दूर अकेले चलते देखा।

अब अपने दु:ख के सागर को है, सुख चैन हमारा धोते देखा.

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