तुमने कब देखा था मुझको, क्या याद है तुमको।
जब मैंने देखा था तुमको या उससे भी पहले, क्या याद है तुमको।
मैं निश्चल निर्मल वहां से गुजरता था
शायद वर्षों से ............
जहाँ खड़ी तुम करती थी
इन्तेजार किसी का , क्या याद है तुमको
शायद तुम्ही ने पहली बार दी थी
बधाई नए साल की
और पूछी थी खैरियत
मुझसे मेरे हाल की
हंसकर की रह गया था मैं
जवाब मिला न था तब तुमको
आंखों में मेरी ढूंढा था तब
कुछ तुमने, क्या याद है तुमको....
चाय पर फ़िर बुलाया था एक दिन
घर में सबसे मुझे जो मिलाना था
चाह तुम्हारी यही थी शायद
की मुझे अपने नजदीक बुलाना था
तब मुझसे मिलना तुम्हे अच्छा लगता था
साथ मेरा भाता था तुमको
मेरे हँसे हंस देती थी तुम
मेरे से अपनी उदासी ,,,, क्या याद है तुमको...
तुमने तो था मुंझे देवता बनाया
पूजा मुंझे पर कुछ न बताया
साए की तरह साथ रहना चाहां
घुटकर अकेले भी कुछ न जताया
फ़िर हार कर स्वीकारा था तुमने
जो abhist था प्यारा तुमको
प्यार पाकर तुम्हारा मैं
हँसता था मैं वही कुटिल हँसी ,,, क्या याद है तुमको.....