आओ हे मन के कल्पित साथी, कुछ बोलो कुछ बात करो।
अपने अन्तर्मन की बात करो या, मेरे मन से मुलाक़ात करो।
धड़कन की लयपर बात करो या, साँसों की सरगम की बरसात करो।
अपनों अतीत के विचलन में, मुझे भी अपने साथ करो।
चुप रहना तेरा यूँ अपलक देखना, खलता है क्यूँ आज मुझे।
कहना जो चाहो कह दो तुम, है क्यूँ रोका अनायास मुझे।
किसको लेकर चिंतित हो तुम, क्यूँ लगती परेशान मुझे।
कह दो सबकुछ साफ़ अभी, या अब भी है माना अनजान मुझे।
विस्फारित नयनों में रखकर प्रश्नो को, यूँ कबतक मुझे निहारोगी।
बैठी हो कहने तो कह ही डालो, या यूँ ही निःशब्द पुकारोगी।
चंचल मन को शांत करो या, अब भी कुछ देर विचारोगी।
छोड़ संसार के ताना बाना, कब विचारों को अपने संवारोगी।
संशय अब भी दूर हुआ ना, आस फ़िर है बंधाया तुमने।
भ्रमित होने से पहले ही क्यों, है सुलझा मार्ग दिखाया तुमने।
वेदना अपनी पी-पीकर भी, हंसकर मुझे हंसाया तुमने।
मुखरित होंगे अनुतरित प्रश्न , रख हाथ पर हाँथ जताया तुमने।
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