नवंबर 13, 2008

अनुतरित प्रश्न

आओ हे मन के कल्पित साथी, कुछ बोलो कुछ बात करो।

अपने अन्तर्मन की बात करो या, मेरे मन से मुलाक़ात करो।

धड़कन की लयपर बात करो या, साँसों की सरगम की बरसात करो।

अपनों अतीत के विचलन में, मुझे भी अपने साथ करो।

चुप रहना तेरा यूँ अपलक देखना, खलता है क्यूँ आज मुझे।

कहना जो चाहो कह दो तुम, है क्यूँ रोका अनायास मुझे।

किसको लेकर चिंतित हो तुम, क्यूँ लगती परेशान मुझे।

कह दो सबकुछ साफ़ अभी, या अब भी है माना अनजान मुझे।

विस्फारित नयनों में रखकर प्रश्नो को, यूँ कबतक मुझे निहारोगी।

बैठी हो कहने तो कह ही डालो, या यूँ ही निःशब्द पुकारोगी।

चंचल मन को शांत करो या, अब भी कुछ देर विचारोगी।

छोड़ संसार के ताना बाना, कब विचारों को अपने संवारोगी।

संशय अब भी दूर हुआ ना, आस फ़िर है बंधाया तुमने।

भ्रमित होने से पहले ही क्यों, है सुलझा मार्ग दिखाया तुमने।

वेदना अपनी पी-पीकर भी, हंसकर मुझे हंसाया तुमने।

मुखरित होंगे अनुतरित प्रश्न , रख हाथ पर हाँथ जताया तुमने।

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अनुभव

पनों का बिखराव यहाँ, पल-पल मैंने होते देखा,

मीलों फ़ैली राहों पर भी, कुंठाओं को उगते देखा।

स्में जीती रही यहाँ, हर भाव सुमन उजड़ते देखा।

मो से घिरे मानव मन में, फ़िर सपनो को उगते देखा।

मसे पूछा आज किसी ने, अब किसे है रोते देखा।

रीतों को तुम भूल गए अब, जो भार पराया ढोते देखा,

श्कर पूरा छोड़ तुम्हे क्यों, दूर अकेले चलते देखा।

अब अपने दु:ख के सागर को है, सुख चैन हमारा धोते देखा.

संदेश

आज मिला संदेश तुम्हारा,
आँचल में बस प्यार लिए।
आह्वान तुम्हारे कुशल क्षेम का,
आँसू का भी हार लिए।
आमंत्रण एक मृदुल स्नेह का,
आजन्म समर्पण विस्तार लिए।
आकलन मेरे समग्र अतीत का,
आचार, विचार, व्यवहार लिए।
आदर्श बने केवल तुम मेरे,
आशाएं मन में शतबार लिए।
आज लिखूंगा मैं भी तुमको,
आशा अपनी- पर इनकार लिए।

अपेक्षा

प्रथम प्रहर की बन नव अस्मिता,
तिमिर तिरोहण की पहलगामी।
मानवता की पहचान बने जो,
राहों की विस्मृत अनुगामी।
का अविचल आँचल थामे,
ल्पित भावो की संगामी।
वादों का रचकर प्रगाढ़ समन्वय,
चना स्व भवितव्य द्रुतगामी।

अनुराग सजे

मुस्कानों को साथ लिए, जीवन की हर साँस सजे।

खुशियों की बारात लिए, जीवन की हर रात सजे

छटे रैन अंधियारी हर पल, निशदिन नव प्रभात सजे।

सफलता का हार लिए, हर हरो में भी जीत सजे।

दूर रहो तुम चाहे जितना, उतना ही ये प्यार सजे।

तुम जियो लाख बरस पर, जीवन के पल शतबार सजे।

मेरे स्नेहो का साथ लिए, तुम्हारे ह्रदय में बस अनुराग सजे।


प्रियंवदे

प्रियंवदे

तिरस्कृत मन से प्रेम याचना , कैसे करूँ मैं प्रियंवदे ।

आहत मन में धैर्य साधना , सफल हो कैसे प्रियंवदे ।।

निश्चलता के तापोवन्य में, मुखरित कबसे अटल सत्य था।

उस सत्य को विस्मृत कर, मै तुम्हे कहूँ क्या प्रियंवदे ।। 1 ।।

शील-स्नेह का वरद हस्त था, समर्पण का भाव प्रबल था ।

परहित में निज सुख चिंतन, संकल्पों का ताज अटल था।

होता मन से प्रेम समन्वय, पर प्रेम का सार सरल था।

मेरे मन के इस कोनो में, भाव समन्वय अति प्रबल था ।

नीरवता के इस स्वर्णिम क्षण में, है कौन यहाँ फ़िर रचदे।

अनुरागित मम स्वांस सूत्र में, अनुबंधित वह दृश्य प्रियंवदे ।।२।।

सपना

मर्पित मन से नवल साधना, जीवन का आधार बने।

पल का यह निर्मल सपना, कल तक जब साकार बने।

ना हो विस्मृत मनःपटल से, जो कल तक तेरे साथ चले।

जैसा चाहे रंग भरो तुम, जब - जब नयी बहार मिले।

मिले बस आंसू तुमको , नित नयी खुशी हजार मिले।

अपने सुख का सागर अर्पित, जो तेरे खुशी का हार बने।

परिभाषा

कल्पना के स्वर्णिम क्षण में , निहित वेदना कोमल शांत ।
कैसा है यह मृदुल समन्वय , समक्ष तुम्हारे मन पुनः अशांत । ।
संघर्ष सदा अपनों से होना , कह्दूं कैसे दिल का वृतांत ।
नियति दे अब इसको परिभाषा , क्यों मन रहता नित्य नितांत । ।

खोजे नजरे हर पल तुमको ,तुम जब भी हमसे दूर रहे ।
पा करीब फ़िर झुकती नजरें , किससे नैनों की बात कहें । ।
अंत मेरा क्या होगा ऐसा , जैसे पुष्प रहे बिन गंध ।
नियति दे इसको परिभाषा , इधर हूँ मैं और उधर सुगंध । ।

आकांक्षा

"विद्या नन्दनवार"


विश्वास की तुम प्रज्वालिका ,
अद्वतिया स्व प्रसंगिका ।
यावद् प्रफुल्लित मम् प्रियदर्शनी ,
नंदनवन सम प्रवाहिका ।
र्शन की मम प्रवाहिनी ।
वल सबल बनी प्रकाशिका
वारे तुमपे सब प्राण -प्राण ,
दो ऐसी प्रशास्तिका । ।

कामना

"जया श्रीराव"

कामना है तुमसे .........

कोई भी गीत ना हो,
और तुम चाहो कुछ गुनगुनाना!
यादों के हंसीं ताजमहल में
बरबस ही हमें बुलाना,
श्री गणेश के क्रम में देखो,
गीत प्रेम के गाना।
रा प्रेम का लय प्रेम का
प्रेम के क्रम में हमें सजाना

यदि ऐसा न हो तो .........

रना अपनी मृदुल हंसीं में,
खुशी दो - चार मिलाके ।
अपनी पुरानी यादों को ,
सपनो में ही बुलाना । ।

नवंबर 12, 2008

रीत

"रीना जायसवाल"

रीतों को किसने मान दिया,
किसने दर्द पराया जाना.
ना को किसने पहचान दिया
किसने साथ को साथ है माना.

जागा जो है बरसो सोकर,
उसने किसीको क्या जाना.
को किसने दान दिया है,
किसने भेद काल का जाना.

बको सुख की चाह रही है,
जिसने मुझे पहचाना.
वादा कर जो भूले मुझको,
क्या खूब मुझे पहचाना.

गते जो भी भले-भले थे,
मैंने आज उन्हें भी जाना.
अब अपने कल की खातिर,
मुझे सबको है बिसराना.