तरन्नुम - ए - उल्फ़ाए बाबस्ता एक आरजू नाकाफी है ,
ज़िक्र - ए - अफ़साना दरो दार तारो तार नाकाफी है।
उल्फ़ते इस दौर में हर शख्स है रहगुज़र ,
तेरे हर बात में बस यही एक बात नाकाफ़ी है।
हम यूँ ही तुझसे आदाबे हसरत रखतें हैं ,
मेरी सब हसरतों से ऊपर तेरी ये दुआ काफी है।
ज़िक्र - ए - अफ़साना दरो दार तारो तार नाकाफी है।
उल्फ़ते इस दौर में हर शख्स है रहगुज़र ,
तेरे हर बात में बस यही एक बात नाकाफ़ी है।
हम यूँ ही तुझसे आदाबे हसरत रखतें हैं ,
मेरी सब हसरतों से ऊपर तेरी ये दुआ काफी है।