सागरसम विस्तृण, आल्हादित सुमधुर हर्ष,
हर्षित, पुलकित, उत्साहित, उदित नवहृदयंगम उत्कर्ष।
उदित नवहृदयंगम उत्कर्ष, सह सुमधुर गीत स्पंद,
स्पंदित हृदय, कम्पित चेतन, हो मंगलमय नववर्ष।
सागरसम विस्तृण, आल्हादित सुमधुर हर्ष,
हर्षित, पुलकित, उत्साहित, उदित नवहृदयंगम उत्कर्ष।
उदित नवहृदयंगम उत्कर्ष, सह सुमधुर गीत स्पंद,
स्पंदित हृदय, कम्पित चेतन, हो मंगलमय नववर्ष।
आओ हे मन के कल्पित साथी, कुछ बोलो कुछ बात करो।
अपने अन्तर्मन की बात करो या, मेरे मन से मुलाक़ात करो।
धड़कन की लयपर बात करो या, साँसों की सरगम की बरसात करो।
अपनों अतीत के विचलन में, मुझे भी अपने साथ करो।
चुप रहना तेरा यूँ अपलक देखना, खलता है क्यूँ आज मुझे।
कहना जो चाहो कह दो तुम, है क्यूँ रोका अनायास मुझे।
किसको लेकर चिंतित हो तुम, क्यूँ लगती परेशान मुझे।
कह दो सबकुछ साफ़ अभी, या अब भी है माना अनजान मुझे।
विस्फारित नयनों में रखकर प्रश्नो को, यूँ कबतक मुझे निहारोगी।
बैठी हो कहने तो कह ही डालो, या यूँ ही निःशब्द पुकारोगी।
चंचल मन को शांत करो या, अब भी कुछ देर विचारोगी।
छोड़ संसार के ताना बाना, कब विचारों को अपने संवारोगी।
संशय अब भी दूर हुआ ना, आस फ़िर है बंधाया तुमने।
भ्रमित होने से पहले ही क्यों, है सुलझा मार्ग दिखाया तुमने।
वेदना अपनी पी-पीकर भी, हंसकर मुझे हंसाया तुमने।
मुखरित होंगे अनुतरित प्रश्न , रख हाथ पर हाँथ जताया तुमने।
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सपनों का बिखराव यहाँ, पल-पल मैंने होते देखा,
मीलों फ़ैली राहों पर भी, कुंठाओं को उगते देखा।
रस्में जीती रही यहाँ, हर भाव सुमन उजड़ते देखा।
मोह से घिरे मानव मन में, फ़िर सपनो को उगते देखा।
हमसे पूछा आज किसी ने, अब किसे है रोते देखा।
रीतों को तुम भूल गए अब, जो भार पराया ढोते देखा,
लश्कर पूरा छोड़ तुम्हे क्यों, दूर अकेले चलते देखा।
अब अपने दु:ख के सागर को है, सुख चैन हमारा धोते देखा.
खुशियों की बारात लिए, जीवन की हर रात सजे।
छटे रैन अंधियारी हर पल, निशदिन नव प्रभात सजे।
सफलता का हार लिए, हर हरो में भी जीत सजे।
दूर रहो तुम चाहे जितना, उतना ही ये प्यार सजे।
तुम जियो लाख बरस पर, जीवन के पल शतबार सजे।
मेरे स्नेहो का साथ लिए, तुम्हारे ह्रदय में बस अनुराग सजे।
प्रियंवदे
तिरस्कृत मन से प्रेम याचना , कैसे करूँ मैं प्रियंवदे ।
आहत मन में धैर्य साधना , सफल हो कैसे प्रियंवदे ।।
निश्चलता के तापोवन्य में, मुखरित कबसे अटल सत्य था।
उस सत्य को विस्मृत कर, मै तुम्हे कहूँ क्या प्रियंवदे ।। 1 ।।
शील-स्नेह का वरद हस्त था, समर्पण का भाव प्रबल था ।
परहित में निज सुख चिंतन, संकल्पों का ताज अटल था।
होता मन से प्रेम समन्वय, पर प्रेम का सार सरल था।
मेरे मन के इस कोनो में, भाव समन्वय अति प्रबल था ।
नीरवता के इस स्वर्णिम क्षण में, है कौन यहाँ फ़िर रचदे।
अनुरागित मम स्वांस सूत्र में, अनुबंधित वह दृश्य प्रियंवदे ।।२।।
समर्पित मन से नवल साधना, जीवन का आधार बने।
पल पल का यह निर्मल सपना, कल तक जब साकार बने।
ना हो विस्मृत मनःपटल से, जो कल तक तेरे साथ चले।
जैसा चाहे रंग भरो तुम, जब - जब नयी बहार मिले।
न मिले बस आंसू तुमको , नित नयी खुशी हजार मिले।
अपने सुख का सागर अर्पित, जो तेरे खुशी का हार बने।
"विद्या नन्दनवार"
"जया श्रीराव"
"रीना जायसवाल"