कल्पना के स्वर्णिम क्षण में , निहित वेदना कोमल शांत ।
कैसा है यह मृदुल समन्वय , समक्ष तुम्हारे मन पुनः अशांत । ।
संघर्ष सदा अपनों से होना , कह्दूं कैसे दिल का वृतांत ।
नियति दे अब इसको परिभाषा , क्यों मन रहता नित्य नितांत । ।
खोजे नजरे हर पल तुमको ,तुम जब भी हमसे दूर रहे ।
पा करीब फ़िर झुकती नजरें , किससे नैनों की बात कहें । ।
अंत मेरा क्या होगा ऐसा , जैसे पुष्प रहे बिन गंध ।
नियति दे इसको परिभाषा , इधर हूँ मैं और उधर सुगंध । ।
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