कुछ धुंधला सा मैं स्वप्न बुनकर आया हूँ,
यादों के धुंधलके में धूमिल सा,
हास परिहास के बीच उलझे,
परस्पर सौहाद्र का अतुलनीय प्रेम,
अभिलाषाओं से पूरित कर,
अभिव्यक्ति से हो परिपूर्ण, मैं आया हूँ।
कुछ धुंधला सा मैं स्वप्न बुनकर लाया हूँ....
माँ, आपका आँचल सदैव,
हर्ष सबका द्विगुणित करता रहा,
कोमल हृदयस्पर्शी विचार सदा,
वात्सल्य से भरपूर रहा,
दृढ़ मनोबल की उस प्रतिमूर्ति को,
नमन करते, नतमस्तक हो आया हूँ।
कुछ धुंधला सा मैं स्वप्न बुनकर लाया हूँ...
हर तीज-त्योहार में रचा बसा,
अनुपम सुस्वाद का वो अमृतमयी अहसास,
क्षुधा प्रतिपल हरता रहा,
निर्झरी सी काव्य सरिता गतिमान सी,
चित्रपट पर भी उकेरी छवि अभिराम सी,
पाँचों इन्द्रियों को कर तृप्त मैं आया हूँ,
कुछ धुंधला सा मैं स्वप्न बुनकर लाया हूँ...
स्नेह बंधन की दृढ़ता,
मित्रवत तव प्रेम का गर्वोन्नमत शीश,
पापा जी,
आपके अतुलनीय सम्मान का,
बन श्वेत कपोत मैं आया हूँ,
कुछ धुंधला सा में स्वप्न बुनकर लाया हूँ।
अमूल्य निधि आपके जीवन के,
अभिलाषा, संजय , अनुभूति व अभिषेक है,
जीवन पथ पर निरंतर हो गतिमान,
आप दोनों का मार्ग दर्शन विशेष है,
आपके अदृश्य स्वप्न को देने मूर्तता,
कुछ धुंधला सा मैं स्वप्न बुनकर लाया हूँ।
मामा-मामी, मौसी-मौसा सब,
एकाकार हो , जिस सरिता से पोषित हुए,
उस सरिता, उस नाना-नानी के
अपूरित विछोह से हो व्यथित,
आपके विशेष अनुकंपा से होने अनुग्रहित,
कुछ धुंधला सा मैं स्वप्न बुनकर लाया हूँ।
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